शासकीय कार्य में बाधा के चलते न्यायालय से ही मिल सकती है राहत
दमोह। दशहरा पर्व के दौरान कोतवाली थाना क्षेत्र के फुटेरा तालाब में मुख्य नगर पालिका अधिकारी दमोह राजेंद्र लोधी और भाजपा के पूर्व महामंत्री सतीश तिवारी के बीच हुए विवाद को लेकर गुरुवार को दोनों पक्षों का आपसी सुलह का वीडियो सामने आया। कलेक्टर कक्ष के बताए जा रहे इस वीडियों में दोनों पक्ष विवाद को गलतफहमी बताते हुए सामाजिक सद्भाव बनाए रखने की मंशा के साथ विवाद पर क्षमा मांगकर विवाद को समाप्त करने की बात कह रहे है। जहां एक ओर विवाद के शांत होने के बाद पुलिस प्रशासन राहत की साँस ले रहा है, वही कानून के जानकार अभी भी इस मामले में वगैर न्यायालय के पूर्ण राहत ना मिलने की बात कह रहे है।
सोशल मीडिया पर गरमाया था माहौल
इस पूरे विवाद में जहां एक और सीएमओ पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और अभद्रता के आरोप थे तो दूसरी ओर सतीश तिवारी व अन्य लोगों पर जातिगत टिप्पणियों और मारपीट। के आरोप सामने आ गए थे। ऐसे में सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और विरोध के चलते सामजिक समीकरण बिगड़ने लगे थे। हालात यह बने कि कार्यवाही की मांग को लेकर ज्ञापन सहित आंदोलन और प्रदर्शन की घोषणाएं भी की जाने लगी थी। इस दौरान आवेदन, ज्ञापन और सामने आए वीडियो के आधार पर कोतवाली थाना पुलिस ने सतीश तिवारी पर बुधवार को शासकीय कार्य में बाधा सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज कर लिया था और साथ ही सतीश तिवारी की ओर से दिए गए आवेदन की भी जांच की जा रही थी।
बिगड़ते हालातो के बीच सामने आए वीडियो
ऐसे बिगड़ते हालात और प्रत्यारोप और शिकायतों के बीच जहां सबसे पहले बुधवार को सीएमओ राजेंद्र लोधी ने एक वीडियो जारी कर कानून अनुसार कार्यवाही होने की बात कहते हुए लोगों से किसी भी तरह से सामाजिक सद्भाव को ना बिगाड़ने की अपील की थी। वहीं दूसरे दिन दोनों पक्षों का एक साथ वीडियो सामने आ गया।
कानूनी राहत अभी भी नहीं
इस मामले में वीडियो जारी होने के बाद सुलह की बात कह दी गई है लेकिन भारतीय कानून के अनुसार अभी भी इस मामले में तत्काल राहत नहीं मिल सकती है। दरअसल शासकीय कार्य में बाधा डाले जाने पर दर्ज हुआ अपराध किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं बल्कि शासन के विरुद्ध अपराध माना जाता है। ऐसे में महज कैमरे के सामने आकर की गई सुलह मान्य नहीं होती। इस प्रकार के मामलों में पुलिस को जांच जारी रखनी होती है और विधिवत चालान या क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत करना होता है। इसके बाद इस मामले में दो विकल्प शेष रह जाएंगे या तो दोनों पक्ष उच्च न्यायालय जाकर वहां से एफआईआर को रद्द कराए या फिर ट्रायल कोर्ट के फैसले तक इंतजार करें। हालांकि दोनों स्तर पर ही न्यायालय इस मामले में हुई सुलह के स्थान पर मामले के समाज पर होने वाले प्रभाव को प्राथमिकता देते हुए फैसला देगा, यानि की फैसले पक्ष में आने के आधार पर ही कोई राहत अब मिल सकेगी।