दमोह में फिर फर्जी डॉक्टरों का खुलासा, आखिर जिम्मेदार कौन?

संजीवनी क्लीनिक में फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी

अंकित बसेडिया (8982838152)

दमोह।जिले के संजीवनी क्लीनिक में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कार्य कर रहे दो कथित डॉक्टरों की गिरफ्तारी ने जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है। पुलिस ने ग्वालियर निवासी डॉ. कुमार सचिन यादव और सीहोर निवासी डॉ. राजपाल गौर को गिरफ्तार किया है, जबकि जबलपुर निवासी एक अन्य व्यक्ति से पूछताछ जारी है। आरोप है कि फर्जी MBBS डिग्री, मेडिकल रजिस्ट्रेशन और अन्य दस्तावेजों के सहारे अस्पताल में नियुक्ति हासिल की गई थी।

पाँच सवाल जिसका नही मिला जबाब

  1. फ़र्ज़ी डॉक्टरों द्वारा किस-किस जगह पर पदस्थापना ली गई ?
  2. कितने मरीज का इलाज किया गया ?
  3. उन मरीजों में से किसी व्यक्ति की मृत्यु तो नही हुई है?
  4. इन फर्जी डॉक्टरों के दस्तावेजों की जांच किसके द्वारा की गई थी??
  5. किन संदिग्ध नटवरलाल गिरोह द्वारा उनकी डिग्रियां बनाई गई। और अभी उनकी चेन में कितने लोग फर्जी डॉक्टर बनकर लोगों का इलाज प्रदेश में कर रहे हैं

मिशन अस्पताल कांड के बाद भी नहीं जागा सिस्टम

(DB फ़ाइल फ़ोटो)

यह वही दमोह है जहां मिशन अस्पताल के कथित फर्जी डॉक्टर “एन जॉन केन” मामले में इलाज के दौरान 7 से 8 निर्दोष मरीजों की मौत के आरोप लगे थे। उस घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था, लेकिन अब संजीवनी क्लीनिक का मामला सामने आने के बाद ऐसा लग रहा है कि सिस्टम ने उस घटना से कोई सबक ही नहीं लिया। सवाल यह है कि जब एक बड़ा कांड पहले हो चुका था, तो उसके बाद निगरानी और सत्यापन व्यवस्था को मजबूत क्यों नहीं किया गया?

सीएमएचओ कार्यालय पर उठे गंभीर सवाल…..

संजीवनी क्लीनिक जिला CMHO कार्यालय के कार्यक्षेत्र के अंतर्गत संचालित होता है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल स्वास्थ्य विभाग और CMHO कार्यालय की कार्यप्रणाली पर उठ रहा है। आखिर फर्जी डिग्री और संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर लोग महीनों तक नौकरी करते रहे और विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी। यदि पहले शिकायत नहीं होती, तो क्या यह पूरा खेल ऐसे ही चलता रहता? शहर में चर्चा है कि शिकायत सामने आने के बाद विभागीय स्तर पर तेजी से कार्रवाई कर खुद को बचाने की कोशिश की गई।

पुलिस वेरिफिकेशन सिस्टम भी घेरे में…..

मामले ने पुलिस वेरिफिकेशन व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकारी अथवा स्वास्थ्य विभाग से जुड़ी नियुक्तियों में संबंधित व्यक्ति का पुलिस सत्यापन भी किया जाता है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इतने बड़े स्तर पर फर्जी दस्तावेजों के साथ नियुक्ति होने के बावजूद प्रदेश के जिलों में पुलिस सत्यापन प्रक्रिया में यह सब कैसे नजर अंदाज हो गया? क्या दस्तावेजों की सही जांच हुई थी या केवल औपचारिकता निभाई गई? लोग पूछ रहे हैं कि जब आम नागरिकों के छोटे-छोटे दस्तावेजों में त्रुटि पकड़ ली जाती है, तो फर्जी डॉक्टरों का पूरा नेटवर्क कैसे बचता रहा?

कार्यवाही में पुलिस टीम की रही भूमिका…..

संपूर्ण कार्यवाही पुलिस अधीक्षक आनंद कलादगी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सुजीत भदौरिया के निर्देशन में एवं नगर पुलिस अधीक्षक हरिराम पांडे के मार्गदर्शन में कार्यवाही हुई। जिसमें कोतवाली थाना प्रभारी मनीष कुमार, उप निरीक्षक नितेश जैन, सहायक उप निरीक्षक रमाशंकर मिश्रा, प्रधान आरक्षक राकेश आठिया (साइबर सेल), प्रधान आरक्षक सौरव टंडन (साइबर सेल), प्रधान आरक्षक हेमंत अवस्थी, अभिषेक चौबे, महेश यादव, अजीत दुबे, आरक्षक ओमप्रकाश रैकवार एवं ब्रजेंद्र मिश्रा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

अब केवल गिरफ्तारी नहीं, जवाबदेही तय होने की मांग

फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है और फर्जी डिग्री, मेडिकल रजिस्ट्रेशन तथा नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े अन्य लोगों की भूमिका भी खंगाली जा रही है। लेकिन शहर में अब यह मांग तेज हो रही है कि केवल फर्जी डॉक्टरों की गिरफ्तारी से मामला खत्म नहीं होना चाहिए। स्वास्थ्य विभाग, CMHO कार्यालय और पुलिस वेरिफिकेशन सिस्टम की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि भविष्य में मरीजों की जिंदगी के साथ इस तरह का खिलवाड़ दोबारा न हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *