दमोह पुलिस व्यवस्था पर नवागत एसपी की पैनी नजर थानों में कम स्टाफ, कार्यालयों में ज्यादा तैनाती और महिला बल की कमी बनी बड़ी चुनौती….

नवागत एसपी के सामने दमोह पुलिस व्यवस्था की असली तस्वीर, कई थानों में महिला अधिकारी तक नहीं

दमोह। जिले में महिला सुरक्षा, संवेदनशील पुलिसिंग और त्वरित कार्रवाई के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। स्थिति यह है कि जिले के कई थानों में आज तक एक भी महिला अधिकारी की पदस्थापना नहीं हो सकी है, जबकि दूसरी ओर बड़ी संख्या में पुलिस बल कार्यालयीन कार्यों और “आरामदायक ड्यूटी” में व्यस्त बताया जा रहा है।

इन थानों में महिला पुलिस व्यवस्था लगभग शून्य

जानकारी के अनुसार दमोह देहात, जबेरा, तेंदूखेड़ा, नोहटा, तारादेही, पथरिया, रनेह, पटेरा, हिंडोरिया, रजपुरा, गैसाबाद एवं मगरोन थानों में न तो महिला उपनिरीक्षक पदस्थ हैं, न महिला एएसआई और न ही पर्याप्त महिला प्रधान आरक्षक मौजूद हैं। ऐसे में महिला अपराधों से जुड़े मामलों में संवेदनशील और प्रभावी कार्रवाई की उम्मीद करना अपने आप में बड़ा सवाल बन गया है।

तेंदूखेड़ा क्षेत्र के थानों में महिला अधिकारियों की भारी कमी

दमोह जिले के तेंदूखेड़ा अनुभाग अंतर्गत आने वाले तेंदूखेड़ा, जबेरा, नोहटा, तारादेही और तेजगढ़ जैसे बड़े थानों में महिला पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों की भारी कमी बनी हुई है। जानकारी के अनुसार पिछले लगभग दो वर्षों से इन थानों में किसी भी महिला थाना प्रभारी की पदस्थापना नहीं हुई है। वहीं महिला उपनिरीक्षक, महिला एएसआई और महिला प्रधान आरक्षक की संख्या भी बेहद सीमित बताई जा रही है। इसके चलते महिला फरियादियों को शिकायत और बयान के लिए कई बार जिला मुख्यालय तक आना पड़ता है।

महिला फरियादियों को न्याय से पहले झेलनी पड़ रही परेशानी

ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं को शिकायत दर्ज कराने या बयान देने के लिए कई बार जिला मुख्यालय तक आना पड़ता है। सवाल यह है कि जब सरकार महिला सुरक्षा को प्राथमिकता बता रही है, तो आखिर इतने बड़े जिले के थानों में महिला अधिकारी तक क्यों उपलब्ध नहीं हैं? क्या महिला सुरक्षा सिर्फ अभियानों और पोस्टरों तक सीमित होकर रह गई है?

थानों में स्टाफ कम, कार्यालयों में ज्यादा

सूत्रों की मानें तो कई पुरुष पुलिसकर्मी, जिनकी वास्तविक पदस्थापना थानों में है, वे वर्षों से विभिन्न कार्यालयों और गैर-फील्ड कार्यों में संलग्न हैं। नतीजा यह है कि थानों में मौजूद सीमित स्टाफ दिन-रात ड्यूटी करने को मजबूर है। कानून व्यवस्था, विवेचना, गश्त और वीआईपी ड्यूटी जैसे कामों का दबाव कुछ कर्मचारियों पर लगातार बढ़ता जा रहा है।

कंट्रोल रूम और कार्यालयों में जरूरत से ज्यादा स्टाफ की चर्चा

विभागीय सूत्रों के अनुसार जिला कंट्रोल रूम सहित कुछ कार्यालयों में आवश्यकता से अधिक पुलिस बल की पदस्थापना लंबे समय से बनी हुई है। जबकि दूसरी ओर कई थाने न्यूनतम स्टाफ के भरोसे संचालित हो रहे हैं। इसी असंतुलन को लेकर अब विभाग के भीतर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं।

नवागत एसपी ने मांगी जानकारी तो “फूले हाथ-पैर”

सूत्र बताते हैं कि नवागत पुलिस अधीक्षक आनंद कलादगी द्वारा हाल ही में अधीनस्थ अधिकारियों से कार्यालयों में पदस्थ अतिरिक्त बल की जानकारी मांगी गई। इसके बाद विभागीय स्तर पर हलचल तेज हो गई और कई अधिकारियों-कर्मचारियों के “हाथ-पैर फूलने” जैसी स्थिति बन गई। चर्चा है कि अब यह पता लगाया जा रहा है कि किस कार्यालय में कितने कर्मचारी वास्तविक आवश्यकता से अधिक वर्षों से जमे हुए हैं।

कोतवाली, देहात और यातायात थाना सबसे ज्यादा प्रभावित

जिले के सबसे व्यस्त माने जाने वाले कोतवाली थाना, देहात थाना और यातायात थाना वर्तमान में सबसे अधिक बल संकट से जूझ रहे हैं। वहीं दूसरी ओर विभागीय गलियारों में चर्चा है कि कुछ कार्यालयों और चौकियों में आवश्यकता से अधिक स्टाफ वर्षों से जमा हुआ है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर फील्ड में काम करने वालों की चिंता कौन करेगा?

“आरामदायक पोस्टिंग” वालों में बढ़ी बेचैनी

नवागत पुलिस अधीक्षक के पदभार संभालने के बाद विभागीय व्यवस्थाओं की समीक्षा शुरू होने की चर्चाएं तेज हैं। माना जा रहा है कि अब ऐसे कर्मचारियों की सूची तैयार हो सकती है जो थानों में पदस्थ होने के बावजूद लंबे समय से कार्यालयीन सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं। इससे “सेटिंग आधारित पोस्टिंग” वाले कर्मचारियों में बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक माना जा रहा है।

सवाल सिर्फ स्टाफ का नहीं, पूरी व्यवस्था का है

महिला अपराधों को लेकर जागरूकता अभियान चलाना और सोशल मीडिया पर कार्रवाई के वीडियो डालना अलग बात है, लेकिन जमीनी स्तर पर थानों की वास्तविक स्थिति कहीं ज्यादा गंभीर दिखाई दे रही है। यदि थानों में पर्याप्त महिला और पुरुष बल ही उपलब्ध नहीं होगा, तो संवेदनशील पुलिसिंग के दावे आखिर कितने प्रभावी साबित होंगे?

अब नजर नए एसपी की कार्रवाई पर

जिले में अब सबसे बड़ी चर्चा यही है कि नवागत पुलिस अधीक्षक केवल समीक्षा बैठकों तक सीमित रहते हैं या फिर वास्तव में थानों तक बल पहुंचाकर पुलिस व्यवस्था में बदलाव लाते हैं। यदि थानों में वास्तविक जरूरत के अनुसार स्टाफ तैनात किया गया, तो यह वर्षों से दबे उस मुद्दे को सामने लाएगा, जिस पर अब तक विभाग के भीतर खुलकर चर्चा तक नहीं होती थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *