अतिक्रमण और नियम विरूद्ध निर्माण पर एनजीटी ने तय की अधिकारियों की जिम्मेदारी
दमोह। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल एनजीटी के ताजा आदेश के बाद प्रदेश भर के तालाबों और वेटलैंड भूमि को सुरक्षित किए जाने के रास्ते फिर खुल गए है। नए नियम के तहत नगरपालिका क्षेत्र में फुल टैंक लेवल और हाई फ्लड लेवल से 50 मीटर और ग्रामीण क्षेत्रों में 250 मीटर के दायरे में वर्ष 2017 के बाद हुए अवैध निर्माणों को हटाने के निर्देश दिए है। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन निर्माणों को नगरपालिका या टाउन एंड कंट्री प्लानिंग की अनुमति मिल गई है, उनको भी इन नियमो के दायरे में रखा गया है। साथ ही अब इन मामलों में अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय की गई है और नियम विरूद्ध निर्माण होने पर अधिकारियों की मिलीभगत इसे माना जाएगा।
ऐतिहासिक निर्णय से बदलेगी तस्वीर
दरअसल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सेंट्रल बेंच भोपाल ने सितंबर माह में नितिन सक्सेना और अन्य की याचिकाओं पर भोपाल वेटलैंड भूमि से जुड़ा यह फैसला सुनाया है। उक्त आदेश जल संरक्षण के प्रति प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट है। अपने निर्णय में ट्रिब्यूनल ने यह स्पष्ट किया है कि पर्यावरण और वेटलैंड संरक्षण के नियम मास्टर प्लान के नियम से ऊपर और सबसे ऊपर हैं और प्रत्येक नगरपालिका को अब यही नियम अपनाना होगा। वहीं आदेश के बाद अब तालाब के निर्धारित क्षेत्र में आने वाले सभी निर्माण अवैध की श्रेणी में होंगे।
नगर के तालाबों की लौटेगी जिंदगी
एनजीटी का यह फैसला नगर के तालाबों की खोती हुई रौनक एक बार फिर लौटा सकता है। दरअसल नगर के फुटेरा तालाब, दीवान जी की तलैया, पुरैना तालाब, बेलाताल समेत अन्य तालाब निर्माण के चलते ना सिर्फ अपनी रौनक खो रहे है, बल्कि इनमें मिलने वाला गंदा पानी इनके अस्तित्व को भी खतरा पैदा कर रहा है। ऐसे में अब एनजीटी के फैसले के बाद अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हो गई है कि ना सिर्फ उन्हें तालाब के क्षेत्र में किए गए अवैध निर्माण को हटाना है, बल्कि उसमें मिलने वाले सीवेज पर भी पूर्ण निगरानी और उपचार सुनिश्चित करनी होगी। इसके अलावा जिले के वेटलैंड की भूमि की जानकारी भी इन्हें सार्वजनिक करनी होगी। इस पूरी व्यवस्थाओं और कार्यवाही को पूर्ण करने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन और नगर निकाय की होगी।