ऑयल बॉन्ड: जब महान अर्थशास्त्री ने पार्टी के भविष्य के लिए खड़ा किया ऋण का पहाड़

भारत की आर्थिक गाथा में कुछ अध्याय ऐसे भी हैं, जिन्हें पढ़कर लगता है कि जैसे कोई जादूगर अपनी टोपी से खरगोश निकालने की बजाय, भविष्य के लिए एक बड़ा सा बिल निकाल कर चला गया हो। ऐसा ही एक ‘जादुई’ अध्याय है यूपीए सरकार के ‘ऑयल बॉन्ड’ का, जिसका अंतिम भुगतान हाल ही में मोदी सरकार ने किया है। इसे ऐसे समझिए, जैसे किसी ने पार्टी तो कर ली, बिल पड़ोसी के नाम कर दिया, और पड़ोसी ने सालों बाद जाकर उस बिल का भुगतान किया हो!

ऑयल बॉन्ड: ‘आज मजे करो, कल देखा जाएगा’ वाली पॉलिसी

बात उन दिनों की है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू रही थीं। जनता में हाहाकार मचा था, और सरकार को लगा कि अगर सीधे-सीधे कीमतें बढ़ा दीं, तो ‘वोट बैंक’ में सेंध लग जाएगी। अब क्या करें? महान अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह जी की सरकार ने एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ खेला। उन्होंने तेल कंपनियों से कहा, “देखो भाई, जनता को नाराज नहीं करना है, तुम अभी हमें उधार दे दो, हम तुम्हें ‘ऑयल बॉन्ड’ नाम का एक चमचमाता कागज का टुकड़ा देंगे।” यह ठीक वैसा ही था, जैसे कोई दोस्त कहे, “यार, अभी पैसे नहीं हैं, तू उधार दे दे, मैं तुझे एक ‘प्रॉमिसरी नोट’ दे रहा हूँ, भविष्य में चुका दूंगा!”ये बॉन्ड कोई मामूली कागज के टुकड़े नहीं थे, बल्कि भविष्य के लिए एक ‘उधार का पहाड़’ थे। सरकार ने जनता को खुश रखा, तेल कंपनियों को ‘बॉन्ड’ थमा दिए, और सोचा कि ‘कल किसने देखा!’

आंकड़ों का खेल: 3.23 लाख करोड़ का ‘सरप्राइज बिल’

अब जरा इस ‘सरप्राइज बिल’ के आंकड़ों पर गौर फरमाइए। मूलधन और ब्याज मिलाकर कुल 3 लाख 23 हजार करोड़ रुपये! यह इतनी बड़ी रकम है कि अगर आप इसे गिनने बैठें, तो शायद आपकी अगली पीढ़ी भी गिनते-गिनते थक जाए। यूपीए सरकार ने बड़ी चतुराई से यह व्यवस्था की थी कि हर साल बस थोड़ा सा ब्याज चुकाया जाए (लगभग 10 हजार करोड़ रुपये), और मूलधन को भविष्य के लिए ‘टालमटोल’ कर दिया जाए। यह ठीक वैसा ही था, जैसे कोई क्रेडिट कार्ड का बिल सिर्फ मिनिमम ड्यू चुकाकर सोचता है कि उसने कर्ज चुका दिया!

मोदी सरकार: जब ‘पड़ोसी’ ने आखिरकार बिल चुकायाऔर फिर आई मोदी सरकार। उन्होंने देखा कि यह ‘उधार का पहाड़’ अभी भी खड़ा है। अब क्या करें? पार्टी तो किसी और ने की थी, लेकिन बिल तो देश का था। तो, मोदी सरकार ने कमर कसी और एक-एक करके इन बॉन्डों का भुगतान करना शुरू किया। हाल ही में, इस ‘उधार के पहाड़’ की अंतिम किश्त भी चुका दी गई है। इसे ऐसे समझिए, जैसे किसी ने सालों से जमा हुआ कूड़ा साफ कर दिया हो, ताकि घर में थोड़ी शांति आए। यह कदम दिखाता है कि सरकार ‘आज की वाहवाही’ से ज्यादा ‘कल की सफाई’ में विश्वास रखती है।

नीतिगत दूरदर्शिता: या ‘दूर की कौड़ी’

यह पूरा किस्सा हमें सिखाता है कि जब सरकारें ‘आज की रोटी’ के लिए ‘कल का खेत’ बेच देती हैं, तो उसका खामियाजा अंततः सबको भुगतना पड़ता है। मनमोहन सिंह सरकार की इस नीति पर व्यंग्य इसलिए भी बनता है क्योंकि एक ‘महान अर्थशास्त्री’ से ऐसी ‘दूर की कौड़ी’ वाली नीति की उम्मीद नहीं की जाती। यह तो ऐसा ही है जैसे कोई डॉक्टर मरीज को दर्द निवारक दे दे, लेकिन बीमारी का इलाज न करे।

वर्तमान सरकार का सफाई अभियान’ जारी

यदि हम थोड़ा और गहराई से देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि कुछ पिछली सरकारों ने अपनी नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था को ‘अस्थमा’ दे दिया था, और कभी-कभी तो ‘गृहयुद्ध’ जैसे हालात पैदा करने से भी नहीं हिचकिचाईं। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने खुद को ऐसी ‘बीमारियों’ से दूर रखा है, और देश की आर्थिक ‘सेहत’ को सुधारने का ‘सफाई अभियान’ जारी रखा है।

अब बस यही उम्मीद है कि रामजी देश पर अपनी कृपा बनाए रखें, और भविष्य में कोई भी सरकार ऐसा ‘उधार का पहाड़’ न खड़ा करे, जिसका बिल अगली पीढ़ियों को चुकाना पड़े। आखिर, ‘उधार’ लेना आसान है, चुकाना मुश्किल!

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