फर्जीवाड़े का गढ़ बनता दमोह! सिस्टम की लापरवाही या भीतर तक फैला संरक्षण?

अंकित बसेडिया दमोह (8982838152)
दमोह।जिले संजीवनी क्लीनिक में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कार्यरत दो कथित डॉक्टरों की गिरफ्तारी ने जिले की प्रशासनिक और सत्यापन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि फर्जी MBBS डिग्री और मेडिकल रजिस्ट्रेशन के सहारे आरोपी लंबे समय तक मरीजों का इलाज करते रहे। बताया जा रहा है कि इन कथित डॉक्टरों द्वारा 1100 से अधिक लोगों का उपचार किया गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इतने लंबे समय तक पूरा सिस्टम आंखें बंद कर कैसे बैठा रहा।
सत्यापन प्रक्रिया पर सबसे बड़ा सवाल
पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ी चूक सत्यापन प्रक्रिया को माना जा रहा है। चाहे वह स्वास्थ्य विभाग हो या पुलिस सत्यापन प्रणाली, दोनों स्तरों पर गंभीर लापरवाही की चर्चा है। सरकारी अथवा स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी नियुक्तियों में दस्तावेजों और व्यक्ति का सत्यापन अनिवार्य प्रक्रिया मानी जाती है, लेकिन इसके बावजूद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नियुक्तियां होना व्यवस्था की कार्यशैली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहा है।
कलेक्टर और एसपी कार्यालय के इर्द-गिर्द घूमती है पूरी प्रक्रिया

जानकारों का कहना है कि किसी भी सरकारी नौकरी या पद स्थापना की प्रक्रिया अंततः जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक कार्यालय के इर्द-गिर्द ही घूमती है। दस्तावेज सत्यापन, चरित्र सत्यापन, विभागीय अनुमोदन और प्रशासनिक प्रक्रिया का मुख्य केंद्र यही तंत्र होता है। ऐसे में यदि प्रारंभिक स्तर पर ही गलतियां नहीं पकड़ी जाएं, तो वही छोटी चूक बाद में बड़ा रूप लेकर पूरे सिस्टम को खोखला कर देती है। लोगों का कहना है कि जब फर्जी दस्तावेजों के सहारे लोग संवेदनशील स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच रहे हैं, तो यह केवल एक विभाग की नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की सामूहिक विफलता मानी जाएगी।
नवागत कलेक्टर और एसपी से कार्रवाई की उम्मीद

जिले में लगातार सामने आ रहे फर्जीवाड़ों को देखते हुए अब लोगों की नजर नवागत जिला कलेक्टर प्रताप नारायण यादव और पुलिस अधीक्षक आनंद कलादगी पर टिकी हुई है। लोगों का कहना है कि वरिष्ठ अधिकारियों को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की कार्यप्रणाली की गहराई से समीक्षा करनी चाहिए, क्योंकि बार-बार सामने आ रहे मामलों ने जिले की प्रशासनिक साख को प्रभावित किया है।
बंदूक लाइसेंस से पासपोर्ट तक उठे थे सवाल

दमोह में यह पहला मामला नहीं है जब सत्यापन और दस्तावेज प्रक्रिया पर सवाल उठे हों। पूर्व में जिला कलेक्टर कार्यालय में बंदूक लाइसेंस बनाने के नाम पर नकली चालान के जरिए भुगतान का मामला सामने आया था, जिसने प्रशासनिक ढांचे को झकझोर दिया था। वहीं वर्ष 2025 में जबलपुर ATS द्वारा पकड़े गए 6 संदिग्धों में से 3 लोगों के पासपोर्ट आवेदन दमोह पासपोर्ट कार्यालय से किए गए बताए गए थे। इस मामले ने भी जिले की पासपोर्ट सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिए थे।
एक ही विभाग में वर्षों से जमे कर्मचारियों पर चर्चा
सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं में यह बात भी सामने आ रही है कि कई विभागों में वर्षों से एक ही पद पर जमे कर्मचारियों के कारण व्यवस्था में पारदर्शिता प्रभावित हो रही है। लोगों का मानना है कि लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने से विभागीय नेटवर्क मजबूत हो जाते हैं, जिससे सत्यापन और कार्रवाई की प्रक्रिया प्रभावित होती है।
खाद्य विभाग की कार्यप्रणाली पर भी उठ रहे सवाल

जिला प्रशासन में पदस्थ खाद्य विभाग को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विभाग द्वारा लगातार कार्रवाई तो की जाती है, लेकिन उन कार्रवाइयों का अंतिम परिणाम सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आता। सूत्रों के अनुसार विभागीय कार्रवाई कई बार चयनात्मक नजर आती है, जिससे निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
अब पूरे सिस्टम की जांच की उठ रही मांग

फर्जी डॉक्टर मामले के बाद अब आम लोगों के बीच यह मांग तेज हो रही है कि केवल आरोपियों की गिरफ्तारी तक मामला सीमित नहीं रहना चाहिए। स्वास्थ्य विभाग, पुलिस सत्यापन प्रणाली, प्रशासनिक प्रक्रिया और संबंधित विभागों की भूमिका की व्यापक जांच होनी चाहिए। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते व्यवस्था में सुधार नहीं हुआ तो भविष्य में इससे भी बड़े मामले सामने आ सकते हैं।