शताब्दी वर्ग के कार्यक्रमों की श्रृंखला में आरएसएस का प्रमुख जन गोष्ठी आयोजित

दमोह। संघ के शताब्दी वर्ष पर आयोजित हो रहे कार्यक्रमों की श्रृंखला में रविवार को नगर के पीजी कॉलेज ऑडिटोरियम में प्रमुख जन गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में क्षेत्रीय संघ चालक ओपी सक्सेना जी उपस्थित रहे जिन्होंने वर्तमान विषयों पर अपने विचार उपस्थित जन के समक्ष रखें।
कार्यक्रम का आरंभ भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इस दौरान मंच पर नगर संघ चालक विकास चौहान की उपस्थिति में मुख्य वक्ता ने संघ की स्थापना, संघ के कार्यों और संघ की समाज में सकारात्मक परिवर्तन की सोच को बताया।अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि हम सभी संघ से परिचित है और संघ की चर्चा भी होती रहती है। हम और हमारे बीच के कई लोग संघ से जुड़े हुए हैं। आज संघ से संबंधित कई संगठन भी है और इसका कार्य खुले मैदान में होता है और इसके लिए कोई चंदा या राशि भी नहीं ली जाती।फिर भी जन सामान्य को संघ का कार्य खुफिया लगता है। लंबे समय में संघ को खुद को दिखाने की कमी महसूस नहीं हुई लेकिन 100 वर्षों की यात्रा के बाद अब संघ आपके बीच आकर अपने कार्यों को बता रहा है। संघ की स्थापना केशवराम बलिराम हेगडेवार ने की जो जन्मजात देशभक्त थे। बड़े होने पर कांग्रेस, क्रांतिकारियों और अन्य बातों का अनुभव होने के बाद उन्होंने सोचना शुरू किया कि आखिर हम गुलाम क्यों हुए, क्योंकि भारत हर क्षेत्र में सक्षम और संपन्न थे हम सिर्फ आयात करते थे। तब उन्होंने जाना कि इस देश को अपनी कर्म, धर्म और पूर्वजों की भूमि मानने वाला हिंदू समाज जब एक होता है एक सोचता है तो देश बहुत सुव्यवस्थित और सक्षम होता है। भारत एक था और उसे एक रूप में देखने की क्षमता थी लेकिन लंबे आक्रमणों के बाद हिन्दू टूटा तो देश भी टूटा। यह समझ कर उन्होंने जाना कि जो हिंदू समाज देश के लिए मर मिट रहा है उसे कोई नहीं समझ रहा और वह उपेक्षित है। इसलिए उन्होंने यह समझकर कि ऐसी आजादी मिल भी गई तो टिकेगी नहीं। यह सोचकर उन्होंने समस्त राजनीतिक दायित्वों को अलग रखकर संघ को प्रारंभ किया और यह सोच रखी कि देश में कही भी कुछ जो उसके लिए देश का हर एक हिन्दू सामने आएगा उसके लिए खड़ा रहेगा। जब मूलतः हिंदू राष्ट्र के लिए सभी खड़े रहेंगे। हिंदू कौन है जो मातृभूमि को सबकुछ अपना मानता है और खुद को भारत माता का शिशु माने वह सब हिन्दू है। इस भाव से संघ का कार्य शुरू किया। उसके पहले भी कई लोगों ने इस कार्य को किया है।
पंच परिवर्तन ही राष्ट्र निर्माण के मूल तत्व
उन्होंने पांच परिवर्तन विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण संभव है।भाव के आचरण के अनुसार व्यक्तित्व निर्माण होगा यदि चरित्र संपन्न नहीं होगा तब तक व्यक्ति में सिर्फ भाव ही रहेगा। इसलिए राष्ट्रीय भाव के साथ एक सही व्यक्तित्व का निर्माण भी हमें करना होगा जो यह कठिन कार्य है।उन्होंने कहा कि संघ का स्वयंसेवक प्रश्न नहीं कार्य करता है इसलिए संघ ने भी लंबे समय तक सिर्फ व्यक्ति निर्माण ही किया। यह वैसा ही है जैसे कोई शिक्षक हमेशा अपने हर विद्यार्थी को सफल बनाना चाहता है। संघ के यह समझा हैं कि मूल समाज परिवर्तन व्यक्ति परिवर्तन है। विश्व की कई सभ्यताएं नष्ट हो गई और अपनी संस्कृति भूल गई लेकिन हिन्दू समाज ने अपना स्वत्व नष्ट नहीं किया अपनी परंपराएं नहीं भूली। जिसके पीछे सत्ता से अलग सामाजिक पंचायतें और सामाजिक सत्ता रही, इसलिए समाज से ही परिवर्तन संभव होगा। संघ में सब एक साथ होते है कोई भेदभाव और सामाजिक भेद नहीं। समाज का व्यक्ति यह सोचे कि मैं, मेरा परिवार और मेरा समाज इस देश इस राष्ट्र के लिए क्या कर सकता है। व्यवस्था से पहले परिवर्तन समाज में आना चाहिए, यह समय लेगा लेकिन स्थाई होगा। हम स्वाधीन तो हुए लेकिन तंत्र विदेशी ही था, कानून और सब विदेशी थे। समय के बाद सब बदला जो समाज में परिवर्तन के कारण है।संघ को समाज की सात्विक वृद्धि पर भरोसा है, इस देश के धार्मिक, पारिवारिक सामाजिक संगठनों में ऐसे तत्व है जो यह करने में सक्षम है। इसलिए आज संघ सज्जन वृद्धि को आमंत्रित करता है कि आप आगे आए और परिवर्तन में साथ दे और हम मिलकर उन परिवर्तनों को करेंगे। उन्होंने आगे कहा कि भारत के संस्कार अमेरिका जैसे नहीं है, हमारे संस्कार सत्ता के लिए पिता को मारना नहीं बल्कि उनके लिए 14 वर्ष का वनवास लेना हमारे संस्कार है। हम आज दुनिया से पारिवारिक मूल्यों में बेहतर है लेकिन अभी भी और बदलाव लाना है। हमें मूल्यों को फिर स्थापित करना है और उसे जीवित कर दिया तो फिर संघ को बदलाव की या बदलाव के लिए संघ की आवश्यकता नहीं है। भारत के स्वभाव में मित्रता है और हमें सभी लोगों को खुद से जोड़ना है। सभी को अपने साथ हमेशा रखना ही असली सद्भाव है। हमें पर्यावरण की भी सोचना हैपानी बचना है, पेड़ लगाना है, हमें प्लास्टिक का उपयोग रोकना है और इसके लिए किसी शासन या न्यायालय के निर्देश की आवश्यकता नहीं है, हम खुद कर सकते है। इसके अलावा हमें स्वत्व का बोध भी करना है। आजादी का आंदोलन किसी कुशासन या गोरे रंग के विरोध में नहीं बल्कि खुद के भाव और व्यवस्था के लिए नहीं अपितु स्वत्व के भाव से थी। बंदे मातरम् गीत एक कवि हृदय की रचना थी जो स्वत्व की मनोभावना थी। हमारे आजादी के समय बनाए गए कारखाने भी स्वत्व की भावना के लिए थे। जिस देश में हम रहते है उसके आसपास के लोग भी हमारे साथ आगे बढ़े यह स्वत्व का भाव है जो लोकल फिर वोकल से आयेगा। हमारे हस्ताक्षर, हमारे नाम हमारी चर्चा हमारी अपनी भाषा में होनी चाहिए। हमने आंदोलनों से कानूनों का भी विरोध किया लेकिन आज हमें कानून को मानने की जरूरत है यह नागरिक दायित्व का बोध है। ऐसे कई विषय इस में समाहित है। इसलिए संघ ने लोगो से इस बदलाव इस कार्य के लिए सहयोग मांगा ताकि पंच परिवर्तन से देश में सकारात्मक परिवर्तन हम ला सकें।
गोष्ठी का समापन वंदे मातरम के गायन के साथ किया गया। कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता राजीव बद्री ठाकुर ने किया, और आभार नगर कार्यवाहक सुरेन्द्र करोसिया ने माना।